Saturday, September 19, 2009

कर्मपथ

आँखों में सपने  , शारीर पर मैले कपड़े,
हांथों में किताबें और सच्चे इरादे,
पैरों में लगी मिट्टी,धुल भरा चेहरा
ढूनती हुयीं आँखें , निहारता हुआ कहता
मैं भारत हूँ ,मुझे कोई गोद ले ले
           विकास की दौड़ में छूटा हुआ बच्चा ,
           जो दौड़ पाने में है कच्चा,
           सहमा हुआ कहता ,
          कोई हाथ मुझे फिर से उठा दे
          मैं भारत हूँ ,मुझे कोई गोद ले ले .
सिसकती हुयी ,ठिठुरती हुयी
पुकारती माँ  भारती,
नए जोश , नए खून के सारथी ,
अरे नवयुवक तुझे माँ भारती पुकारती ,
                    इतना कठोर दिल तू न बन ,
                    मेरी चीख को  अनसूना न कर,
                      आगे बढ़ ,मेरा  सहारा बन
पथ है यें प्रेम का , सदभावना का
तू कर्म कर ,आगे बढ़ ,
कर्मपथ .....कर्मपथ ...कर्मपथ 


यदि आप को यह कविता वास्तव में दिल से अछि लगी हो तो ,आगे  आकर हमारा साथ दें ..........यें देश आपका इंतजार कर रहा है  ........कर्मपथ को अपना  बनाएं

9 comments:

  1. ांआशीश जी बहुत सुन्दर सीख देती कविता के लिये बधाई आपका कर्मपथ भी सफल हो शुभकामनायें बहुत अच्छा लिखते है आप कलम मे दम है आशीर्वाद लिखते रहें

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  2. अति सुन्दर.... वास्तविकता के निकट..... यथार्थ के समान ....

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  3. पथ है यें प्रेम का , सदभावना का
    तू कर्म कर ,आगे बढ़ ,
    कर्मपथ .....कर्मपथ ...कर्मपथ

    bahut sundar abhivyakti.....badhai

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  4. हुज़ूर आपका भी एहतिराम करता चलूं.........
    इधर से गुज़रा था, सोचा, सलाम करता चलूं....

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  5. Bahut barhia... aapka swagat hai... isi tarah likhte rahiye

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  6. khabar dar jo age is tarah liken ki koshish ki...phaltu phokat time kharab kar diya...age se likhi to gala ghot denge..

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  7. I agree with Sriman Ankur Sharma Ji

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